चुपचाप चले आना
दिल में उतर जाना
ज्वार सा उठना फिर
लहरों सा समा जाना.
प्यास बुझे सदियों तक
मैदान से वादियों तक
बनकर हजारों झरने
बस बहते ही जाना.
लोग आयेंगे जायेंगे
किस्से सभी सुनायेंगे
सुनकर ये फ़साना
तुम ऊब मत जाना.
बनकर शिला अहिल्या
सदियों करे प्रतीक्षा
ऋषि श्राप से विमुक्ति
का मार्ग तुम बताना.
-दिनेश चौहान
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