उम्र निकल गई जिनकी मेंहदी हाथों में लग न सकी
हल्दी की रस्मों को देखा अपने हाथो में सज न सकी
शहनाई की धुन बुनते सपनों संग जिनकी पाषाणहुई
करुण कथा उन हृदयों की निर्झर बन के बह न सकी
-दिनेश चौहान
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