होंठ रख कर उरोजों पर सो गया
स्वप्न माँ के हृदय में सारे बो गया.
कोख भरती जिनकी बहुत देर से
मन प्रतीक्षा में अधीर फिर हो गया.
मिट्टी ऊसर नहीं होती है ये कभी
वक़्त मौसम के हाथों में सो गया.
जन्म ना दे सकी वो अगर कृष्ण को
बन यशोदा दूजे का पालन तो किया.
कामनाएँ अधूरी यदि जनन की रह गईं
व्यष्टि ने सृष्टि संग सम्मिलन तो किया.
-दिनेश चौहान
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