आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कामनाएँ अधूरी जनन की रह गईं

                
                                                         
                            होंठ रख कर उरोजों पर सो गया
                                                                 
                            
स्वप्न माँ के हृदय में सारे बो गया.

कोख भरती जिनकी बहुत देर से
मन प्रतीक्षा में अधीर फिर हो गया.

मिट्टी ऊसर नहीं होती है ये कभी
वक़्त मौसम के हाथों में सो गया.

जन्म ना दे सकी वो अगर कृष्ण को
बन यशोदा दूजे का पालन तो किया.

कामनाएँ अधूरी यदि जनन की रह गईं
व्यष्टि ने सृष्टि संग सम्मिलन तो किया.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर