हृदय सारे शुष्क दिखते जम गईं हैं वेदनायें
निर्झरों के श्रोत सूखे गुम हुईं सारी ऋचायें.
वनों में पशु भी चिंतित बस्तियों के दृश्य से
आवरण पशुता के ओढ़े मानव ये क्या कहायें ?
-दिनेश चौहान
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