तोड़ अपने लाज के अनुबन्ध को
फिर हवाएँ आवारगी करने लगीं
तोड़कर तटबंध सारे मानकों के
आँचलो को छेड़ कर चलने लगीं .
गगन को एकाकी छोड़ कर सब
धरा की ओर मुड़ नित बढ़ती रहीं
बदलियों से साजिशें कर के बढ़ी
दिशाएँ प्रतिपल खुद बदलने लगीं .
शिखर पर्वत का छूकर जब चली
दूरियाँ हरदम धरा से बढ़ती दिखीं
धरा से झुक कर जब मिलने चली
गति अपनी ही ठहरती दिखने लगी.
नदी के दोनों कूल सा मिलना कहाँ
एक से मिलना दूसरे का छूटा जहां
मिलन सुख दुःख सा बिछड़ना भी
जिन्दगी हवाओं सी बस चलने लगी.
-दिनेश चौहान
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