लगा देता है आग,
महीना सावन का,
साथ जब नहीं होता
है मनभावन का।
फुहारों से भीगती
रहती है देह ये सारी,
सोमवार से शुक्रवार
तक की नौकरी भारी।
बचे दो दिन जो भी
बन्द बाज़ार भी सारी,
सहो धक्के और टँगी
झोले में जिंदगी भारी।
गुजर जाता है सावन
ये लू के थपेड़ों सा,
नहीं मिलता सुख
चाय और पकौड़ों का।
- दिनेश चौहान
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