चाँद को बदली ने ऐसा ढक लिया
चांदनी मायूस , हांथ चलनी रह गई
सिर्फ करवे गवाही देने को बाकी रहे
रौनकें चेहरों की सारी अधूरी रह गईं .
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X