आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बकरी की जान बच गई

                
                                                         
                            धंसी हुईं आंखें प्यास की कहानी कहती रहीं
                                                                 
                            
दूसरी ओर विकास की नदी भी बहती रहीं .

पक्की सड़क पर चल कर विकास गांव आ गया
रमजान का छप्पर मुखिया का आदमी खा गया.

कच्ची दीवार गिरी तो सारी गृहस्थी दब गई
शुक्र खुदा का कि बकरी की जान बच गई.

रास्ते बन्द थे पानी भरा था कीचड़ के संग
कोई नहीं आया गांव तक यात्रायें हुई भंग.

निर्जला व्रत हो गया इस बाढ़ के पानी में
अनाज सड़ गया प्रदूषण पीने के पानी में.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर