धंसी हुईं आंखें प्यास की कहानी कहती रहीं
दूसरी ओर विकास की नदी भी बहती रहीं .
पक्की सड़क पर चल कर विकास गांव आ गया
रमजान का छप्पर मुखिया का आदमी खा गया.
कच्ची दीवार गिरी तो सारी गृहस्थी दब गई
शुक्र खुदा का कि बकरी की जान बच गई.
रास्ते बन्द थे पानी भरा था कीचड़ के संग
कोई नहीं आया गांव तक यात्रायें हुई भंग.
निर्जला व्रत हो गया इस बाढ़ के पानी में
अनाज सड़ गया प्रदूषण पीने के पानी में.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X