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आज के दौर में...

                
                                                         
                            आज के दौर में
                                                                 
                            
सुख-सुविधाओं का अंबार है,
वो सब कुछ मौजूद है
जो कभी राजाओं के ख़्वाबों में भी नहीं था।

माना कि तब भूख थी,
संघर्ष था,
पर इंसान इंसान था।
खुशियाँ सच्ची थीं,
प्यार पाक था,
और रिश्ते साँस लेते थे।

आज—
सब कुछ है…
सिवाय इंसानियत के।

भाई, भाई की रगों में बहते खून का प्यासा है,
बेटा, माँ-बाप की लाश पर
अपनी इच्छाओं का महल खड़ा कर रहा है।
बहन, भाई को अदालतों में घसीटकर
ज़मीर का सौदा कर रही है।

जवान लड़के-लड़कियाँ
घर की चौखट लांघते ही
संस्कार उतार फेंकते हैं।
भागकर शादियाँ—
या बिना शादी के ही बिस्तर साझा करने की आज़ादी,
जिसे सभ्यता का नाम दे दिया गया है।

शादियाँ मज़ाक बन गई हैं,
तलाक़ उत्सव बन चुका है,
बेटियों की चिताएं जल रही हैं
और सुकून—
जैसे जिन्दगी से निर्वासित हो गया हो।

पत्नी पति की गर्दन पर हाथ रखती है,
पति पत्नी की साँसें गिनता है।
चरित्र अब दोष नहीं,
फ़ैशन बन गया है।

साधु-संत,
जो कभी मार्गदर्शक होते थे,
आज उनमें कुछ
अपराधियों की कतार में खड़े हैं—
और आस्था सलाख़ों के पीछे रो रही है।

ये वही भारत है?
ये वही हिन्द की संस्कृति है?

माना कि इंसान आधुनिक हो गया है,
पर क्या वह
इतना गिर गया है?

फौगाट की क़लम चीख़कर पूछती है—
आख़िर हमें क्या हो गया है?
हम किस अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं?
जहाँ न मंज़िल दिखती है,
न रुकने की इजाज़त है,
और न लौटने का रास्ता…
-दिलबाग सिंह
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6 महीने पहले

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