मैं टीचर हूँ
मगर पढ़ाती कहाँ हूँ ??
कभी पढ़ती हूँ
उनकी बुझी आँखों में
चमकते सपने।
कभी बनती हूँ माँ
उस चौथी बेटी की
जिसने आँखे खोली तो
मगर माँ को न देखा।
कभी कोसती हूँ खुद को
कि क्यों डांटा लगातार
छह दिन ,उस लड़के को
आधार को बैंक अकाउंट से
लिंक न करने पर....!!!
अरे किसके पास फुरसत हैं
उसके काम करने की!
बिन माँ बाप के बच्चे को
नौकर होने पर भी
स्कूल भेजते है ,
कम अहसान है !!!
दिखावे के लिए
हर रोज़ टोकती हूँ
राजकुमार को
देर से आने के लिए,
जानती हूँ न
हर सुबह लोगों के घर
अख़बार डाल कर आता है।
मैं टीचर हूँ
सरकारी स्कूल की।
पढ़ाती कहाँ हूँ!!
पढ़ती रहती हूँ
वो छोटी छोटी
कठोर हथेलियां।
रूखे - सूखे
बढे हुए बाल।
दुःख -तकलीफ
बदतर हाल।
पी टी एम् में
किसी माँ के
चेहरे के निशान
किसी पिता की बेबसी
लाचारी, स्वाभिमान।
क्या पढ़ाऊँ इन्हें ??
इतिहास ? भूगोल ?
पहले ...
एक खुशहाल बचपन
जीने की जंग तो
जीत लें....
फिर पढ़ाऊँगी इन्हें
आज़ादी की जंग।
इस मानसून में
झुग्गी से .....
पक्के कमरे में
चले जाएँ,
फिर बताऊंगी
भारत में वर्षा
कौन सी पवने लाती हैं।
मैं ----
सरकारी टीचर
कहाँ पढ़ा पाती हूँ!!!
खुद ही नही पढ़ पाती
इन्हें
अच्छे से......पूरा।.
धीरजा शर्मा
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