कभी
चिट्ठियों में बसती थीं बातें,
शब्दों में धड़कते थे जज़्बात।
रिश्ते लिफ़ाफ़ों में सफ़र करते थे—
धीरे-धीरे, पर अपनेपन के साथ।
उस कोरे कागज़ पर
उँगलियों का स्पर्श भी ठहरता था,
हाथों की लिखावट में
भावनाएँ भी निखरती थीं।
कहीं स्याही थोड़ी गहरी होती,
कहीं अक्षर हल्के काँपते थे।
फिर लैंडलाइन की घंटी बजी,
तो पूरा घर एक साथ दौड़ पड़ता—
क्योंकि हर कॉल
किसी अपने की आवाज़ लेकर आता था।
फिर मोबाइल आया, इंटरनेट ,
और एक छोटी-सी स्क्रीन में
दुनिया सिमटती चली गई।
अब इमोजी मुस्कुराते हैं,
वीडियो कॉल दूरियाँ मिटाते हैं—
हज़ारों मील दूर बैठा अपना भी
पास-सा नज़र आता है।
हम वह पीढ़ी हैं
जिसने गलियों की दोस्ती भी जी है
और ऑनलाइन दुनिया भी;
दरवाज़े की दस्तक भी सुनी है
और फोन की “Notification” भी।
बस कभी-कभी मन कहता है—
फोन थोड़ा साइड में रख दो,
किसी अपने के साथ बैठकर
चाय के दो घूँट बाँट लो।
तो चलो थोड़ा-सा वक्त बचा लें;
इस डिजिटल दुनिया से चुरा लें,
कुछ पल अपनों के नाम कर दें—
क्योंकि वक्त आज भी उतना ही है…
बस उसे जीने का तरीका बदल गया है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X