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एहसास

                
                                                         
                             एहसास 
                                                                 
                            

मंजिल नहीं खड़ी हो सकती, बिना किसी आधार के ।
हम सब छोटी छोटी रचना,अनुपम रचनाकार के ।।

जिसने दी बुलबुल को सरगम,गीत सुरीले गाये।
वो अनुपम रंगरेज, पुष्प जो बगिया में महकाए ।।

कड़वाहट गुरबेल को दे दी, नीबू भरी खटाई।
उसी मृदा में ईख उगाकर, दे दी हमें मिठाई ।।

नदियों को कक-कल की ध्वनि दी,पायल दी झरनों को ।
मोती दिया सीप को जिसने, कस्तूरी हिरनों को ।।

कारीगरी दिखाई जिसने, तितली के परिधानों में ।
एहसास बना अमराई में, कोयल की मीठी तानों में ।।

जिसने सोखा नीर धरा का, गति दे दी बदली में ।
उसने अनुपम शक्ति भरी है, हवा,धूप,बिजली में ।।

आमंत्रण दे रहा निरंतर, गर्मी शिशिर बसंत को ।
समझ नहीं विज्ञान सका है, उस कर्ता के तंत्र को ।।

बिन कर्ता के क्रिया कोई भी जग में हो न पाती ।
बिन दूल्हे के अर्थहीन हो जाते सभी बराती ।

परम चेतना की रचना हैँ, चेतन जड़ इस जग में ।
पृथ्वी,तारे सूर्य,चंद्रमा पलते जिस आँगन में ।।

सबल नियंत्रण,सफल प्रबंधन, जो जड़ चेतन का करता है ।
समझ वावरे "देवी" क्यों तू उस पर प्रश्न खड़े करता है ।।
-- डी.एल. यादव "देवी"   


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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