बात नहीं ये आज की, हैं ये बहुत पुरानी
पुरानी इतनी कि तब मैं था 10-12 से कम का और हो गया अब 60 से ऊपर का
एक दोपहर अपने घर गाड तिमली, मैं चल दिया चराने बैल, बकरी I
थी रोज़ की ये मेरी ड्यूटी
ले जाना घर के सामने के पाँखो में बैल बकरी चराने
वापसी में साथ लाना होता था सुखी लकड़ी, खाना पकाने I
भादो-असूज का था सायद वह महीना और मौसम था उस दिन साफ-सुहाना
पशु थे चर रहे आराम से हरा चारा
मै अकेला बैठ खेल रहा था गारा I
अचानक मानो आ गयी आसमान में कोई आफत
एक विशाल पंखो वाली कोई चीज उड़ती आसमान में
मारने लगी घूम-घूम कर गाँव के ऊपर चक्कर
घूम रहे थे पंख विशाल उसके तेज़,
आवाज घड़-घड़ की भी रहे थे कर तेज़
और नीचे जमी पर उड़ रही थी धूल
निकल जो रही थी घूमते पंखो से हवा तेज़ I
नहीं थी दूरी उसकी बहुत ज्यादा आसमान में
यु था लग रहा मानो हो ठीक सर के ऊपर
मै था डर रहा कि इसमें बैठा कोई मुझे खींच न ले ऊपर
या फिर उड़ न जाऊ कही आती तेज़ हवा के साथ I
घर के चौतरे पर ही खड़ी, खुद डर से कांपती मेरी दादी चिल्लाई
हे नाती डर ना तू , लुकि जा डालो क पैंथर
न जानी कनि आयी आज आफत या भयंकर
मै भी था गया बैठ तुगलु के झाड़ के नीचे दुबक कर
और था रहा देख ऊपर उड़ती आफत को, झाड़ के पत्ते हटाकर I
कुछ देर लगा कुछ चक्कर वह आफत हो गयी दिखनी बंद
यु लगा कही पास ही उतर जमी पर, गयी कही बैठ
पकड़ कर बैल की पूछ, भाग लिया मैं घर की ओर, दौड़ता आगे-आगे पशुओ को I
था वह एक हेलिकॉप्टर सायद प्राइवेट, जो था गुजर रहा हमारे सुन्दर गाँव के ऊपर I
देख गाँव की सुंदरता पायलट हो गया मोहित
तलाश मैदान बड़ा गांव के पास जो था पोखरी का तप्पड़
उतार दिया उसने वही अपना हेलिकॉप्टर I
नहीं था देखा किसी ने हेलिकॉप्टर कभी पहले
आस पास के घरो से दादा-दादी, चाची-बड़ी और बच्चे सब दौड़ पड़े देखने ये अजूबा
कोई साथ ले आया काखड़ी और कोई मुंगरी
हमारा घर था पोखरी के तप्पड़ से दूर पर मेरे चाचा भी दौड़ पड़े थे तुरंत उस ओर
घर आकर उन्होंने ही था बताया कि वह था एक छोटा जहाज जिसको कहते हेलिकॉप्टर I
ऐसा था वह ज़माना जब गांव में न थी सड़क और न बिजली
जहाज, हेलिकॉप्टर तो थी बात बहुत दूर की
बहुत से लोगों ने सायद तब तक
नहीं होगी देखी कभी बस और रेल तक
उस दिन मिल गया था मौका देखने का हेलिकॉप्टर
बहुत दिनों तक होती रही थी चर्चा उसकी
कुछ कर रहे थे शंका, काहे उतरा होगा गाँव में
कही कुछ न रही हो उनकी बुरी मंशा I
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