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एक ग़ज़ल उन पर

                
                                                         
                            खामोशियों को लफ़्ज़ की ज़ीनत बना दिया,
                                                                 
                            
हमने तो उनके दर्द को राहत बना दिया।
चाहत में उनकी इस तरह डूबे कि क्या कहें,
ख़ुद को ही खुद के सामने हैरत बना दिया।
वो आ रहे हैं आज ये अफ़वाह ही सही,
इस मोड़ पर उम्मीद को क़िस्मत बना दिया।
दुनिया समझ रही है इसे उन पे एक ग़ज़ल,
उनको तो हमने दिल की इबादत बना दिया।
तन्हाइयों से खौफ़ अब आता नहीं हमें,
जबसे उनकी यादों को हुकूमत बना दिया।
-देवेन्द्र पंत
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2 महीने पहले

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