आओ हम सब प्यार के दीप जलाएं, नफरत का अंधकार मिटाए,
दिवाली का यह पावन पर्व, सिर्फ़ पटाखों का शोर नहीं।
यह मन के भीतर का प्रकाश है, बाहर का कोई भोर नहीं,
स्वार्थ की ऊँची दीवारों को, आओ मिलकर गिराएं हम,
खोई हुई सच्ची मानवता को, फिर से गले लगाएँ हम।
सिर्फ़ अपने घर के आँगन में ही, उजियारा क्यों फैलाएं हम,
चलो वहाँ भी रोशनी करें, जहाँ बरसों से फैला है तम।
रोटी को तरसते मासूमों के, होंठों पर मुस्कान सजाएँ हम,
भूखे-प्यासे और बेबस के, मन का सूनापन दूर भगाएँ हम।
सच्चा उल्लास तो तब होगा, जब हर चेहरा मुस्काएगा,
जात-पात और भेद-भाव का, हर बंधन टूट जाएगा।
सद्भाव की गंगा बहे हृदय में, करुणा की हो बौछार,
तभी सार्थक हो पाएगा, दिवाली का यह पावन त्योहार।
मिट्टी के दीयों की सौंधी महक में, छुपी है अपनी संस्कृति,
दिखावे की इस चकाचौंध में, मत खोना अपनी प्रकृति।
एक दीया विश्वास का रखना, एक दीया उम्मीद का जलाना,
बिखर रहे इस ताने-बाने में, भाईचारे का दीप जलाना।
तमसो मा ज्योतिर्गमय का, गूँजे हर तरफ़ पावन गान,
सत्य, प्रेम और मानवता से ही, चमकेगा भारत महान।
-देवेंद्र मणि पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X