वह अकेली है,
और हर रोज़ खुद से कहती है:
"अपराधी तो मैं हूँ,
और एक दिन अपने सभी गुनाह कबूल कर लूँगी,
कोई सजा दे या न दे, मैं खुद को सजा दूँगी।
अगर किसी को लगता है,
मेरे गुनाहों की सजा मौत है,
तो एक दिन खुदकुशी भी कर लूँगी।
मैंने गुनाह किया है,
मैं सब स्वीकार कर लूँगी।
मोहब्बत में अगर किसी का दिल दुखाया,
तो उसे मुझसे बेहतर चाहने वाला मिले,
हर रोज़ उसके लिए ऐसी दुआ करूँगी।
मैं गुनहगार तो हूँ,
और अपने सारे गुनाह कबूल कर लूँगी।"
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हज़ारों शिकायतें हैं मेरे खिलाफ,
मेरे अपनों के पास;
सभी शिकायतों को आँखें बंद कर,
चुपचाप स्वीकार कर लूँगी।
और अगर इनकी सजा है घर से निकाल देना,
तो मैं खुद को 'देश निकाला' जैसी सजा दूँगी।
मैं गुनहगार तो हूँ,
और अपने सारे गुनाह कबूल कर लूँगी।
मैंने कितने ख्वाब देख लिए,
बिना किसी उम्मीद के;
गुनाह यह है कि वे पूरे नहीं होगे,
अब मैं ख्वाब देखना बंद कर दूँगी।
मुकदमा चलता है मेरे खिलाफ,
मैंने मोहब्बत के नाम पर,
किसी की मुस्कुराहट छीन ली;
अब मैं अपने हिस्से का सुकून भी,
उसके नाम कर दूँगी।
अपराधी तो मैं हूँ,
और धीरे-धीरे सब गुनाह कबूल कर लूँगी।
दुनिया कहती है,
बहुत से गुनाह हैं मेरे,
इनकी इतनी आसान सजा नहीं हो सकती;
सच कहते हैं, मैंने भी देखा है,
मैंने इतने गुनाह कर दिए,
जिनकी कभी गिनती भी नहीं हो सकती।
गुनहगार तो मैं हूँ,
सब गुनाह कबूल कर लूँगी;
इस जन्म में नहीं मिल सकी सजा अगर,
तो फिर से एक बार जन्म लूँगी।
गुनाह तो मैंने किए हैं,
मैं गुनहगार तो हूँ,
और धीरे-धीरे सब गुनाह कबूल कर लूँगी।
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