दया आपकी गौशाला में बस्ती है,
बछड़ों को गले लगा ममता बरसती है।
धैर्य आपका गोवर्धन पर दिखता है,
एक उंगली पर पर्वत धर ब्रज बचाते हैं आप।
क्षमा आपकी सबसे न्यारी है,
निन्यानवे तक क्षमा कर सौवें पर चक्र उठाते हैं आप।
न्याय आपका गीता में बोलता है,
कुरुक्षेत्र में अर्जुन को धर्म सिखाते हैं आप।
निरपेक्ष आप सबके होकर भी,
किसी के पक्ष में नहीं, सबके साथ रहते हैं आप।
निरासक्त होकर द्वारका के राजा हैं,
महलों में रहकर भी माया से दूर रहते हैं आप।
तप आपका ऋषियों को भी लजाता है,
बद्रिकाश्रम में नारायण बन तप करते हैं आप।
सौंदर्यमय आपका रूप ऐसा है,
जिसे देखे त्रिलोक मोहित हो जाता है।
सर्वनियंता बन आप विराट दिखाते हैं,
तीनों लोक आपके भीतर समा जाता है।
सर्वज्ञता आपकी है,
सारा ज्ञान आपके चरणों में आ जाता है।
सत्यवादी आप हैं, आपका वचन ही वेद है,
गीता का एक-एक शब्द सत्य बन जाता है।
अपराजेय आप हैं, कोई जीत न सका,
कालिया नाग भी आपके चरणों में नत हो जाता है।
संगीतज्ञ आप बांसुरी ऐसी बजाते हैं,
सुनकर गोपियाँ, गायें सब दौड़ी आती हैं।
नृत्यज्ञ आप रास ऐसा रचाते हैं,
हर गोपी को लगे आप उसी के साथ नाचते हैं।
दानशील आप सुदामा के मुट्ठी भर चावलों पर,
तीनों लोकों का वैभव लुटा देते हैं आप।
नीतिवादी आप सारथी बनकर,
पांडवों को महाभारत जितवा देते हैं आप।
सोलह कला सम्पूर्ण, आप ही पूर्णावतार हैं,
आपके बिना तो सारे शास्त्र बेकार हैं।
जय श्री कृष्ण
- देवकी नन्दन
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