शिक्षक दिवस केवल एक तिथि नहीं,
यह स्मरण है उस प्रथम दीप का,
जो घर के आँगन में जलता है,
और फिर कक्षा तक जाता है।
शास्त्र कहता है —
विद्या ददाति विनयं,
विनय ही मनुष्य को पात्र बनाती है,
और पात्रता ही वाणी को मर्यादा देती है।
आज ज्ञान के विस्तार का युग है,
तकनीक आकाश नाप रही है,
फिर भी यदि शब्दों में ताप बढ़े,
और संवाद में शीतलता घटे,
तो यह चिंतन का विषय है, आरोप का नहीं।
पद बड़ा हो या छोटा,
उसकी शोभा अभद्रता से नहीं,
भाषा की शालीनता से होती है,
विशेषकर जब संबोधन में
मातृ-शक्ति का सम्मान निहित हो।
व्यवस्था के दोष पर चिंता स्वाभाविक है,
पर व्यवस्था व्यक्ति से ही बनती है,
और व्यक्ति का निर्माण केवल अंकों से नहीं, आचरण से होता है।
लोकतंत्र में चयन अंततः लोक का ही दर्पण है,
जैसा हम चुनेंगे, वैसा ही सुनेंगे,
यदि हम शोर को समर्थन देंगे,
तो मौन की अपेक्षा व्यर्थ है।
इसीलिए शिक्षक दिवस पर,
सबसे बड़ा नमन उस प्रथम पाठशाला को,
जो विद्यालय से पहले आती है — परिवार।
जहाँ अक्षर से पहले आचरण सिखाया जाता है।
शिक्षा ही दीप है, गुरु ही प्रकाश है।
जय गुरु देव।
-देवकी नन्दन
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