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सफर अभी जारी है

                
                                                         
                            सफर मेरा जारी है, चल रहा हूँ मैं अभी,
                                                                 
                            
सुबह की पहली किरण में, संभल रहा हूँ मैं अभी।

धुंध अब भी है रास्ते में, पर डर नहीं रहा,
क्योंकि सूर्य चढ़ रहा है, रास्ता दिख रहा है।

कुछ चेहरे मिल रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं,
कुछ बातें सीखा रहे हैं, आगे बढ़ा रहे हैं।

हल्का है जो हाइड्रोजन जैसा,
नम्र होकर भी सूरज गढ़ता है,
सेवा की खुशबू, धर्म का बल बनकर,
कर्तव्य से यश की गंध भरता है।

संस्कार से सुंदर, जिज्ञासा से ज्ञानी,
वैराग्य से त्याग में सुकून रखता है,
ऐसे गुणों वाला जो भी मिले,
वही तो हल्का कहलाता है।

भारी है जो ओगनेसॉन जैसा,
बोझिल, अस्थिर, अंधकार भरता है,
ना खुद ठहरता, ना ठहरने देता,
बस नकारात्मकता में उलझा रहता है।

इसलिए अब दाज्यू,

जो हल्का है, उसे दिल में जोड़ रहा हूँ,
जो भारी है, उसे वहीं छोड़ रहा हूँ।

जैसे-जैसे सूर्य चढ़ रहा है, रास्ता साफ होता जा रहा है,
वैसे-वैसे मन हल्का हो रहा है।
चेहरे साफ़ देख पा रहा हूँ मैं,
जैसे-जैसे सूर्य चढ़ेगा,
सच का उजाला बढ़ेगा।
नकारात्मकता घटेगी,
सकारात्मकता बढ़ेगी ।
चल रहा हूं अभी,
बढ़ रहा हूँ अभी।
- देवकी नन्दन गहतोड़ी
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एक घंटा पहले

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