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इसीलिए कहता हूँ, बस फूल बनके खिलना है।

                
                                                         
                            जो बिखरा है भीतर, उसी को तो समेटना है,
                                                                 
                            
कंक्रीट की दीवार तोड़कर, फूल बनके ही खिलना है।

लोग क्या कहेंगे, ये तो हवाओं का शोर है,
खुद अपनी लौ जलाओ, यही तो दौर है।

पतझड़ ने भी देखा है, हर शाख फिर से हँसती है,
टूट कर भी जो जुड़ जाए, वही तो असली हस्ती है।

रास्ते कहते हैं मंजिल बस थोड़ी दूर है,
तेरे कदमों का ही तो, ये सारा गुरूर है।

ऊँचे शिखर कुछ बोलते नहीं, बस मौन में लड़ जाते हैं,
जो झुकते नहीं तूफानों में, वही इतिहास बनाते हैं।

किसी के टूटे दिल को, तू सहारा बन के देख,
किसी की बुझी आँखों में, सितारा बन के देख।

मन, वचन और कर्म का जब एक यौगिक बनेगा,
तभी तो भीतर का ये सारा अँधेरा मिटेगा।

पंच तत्वों की चादर ओढ़, खुद को पहचान ले,
तू शरीर नहीं, तू तो एक पावन रूह है, ये जान ले।

ना रुक, ना थक, बस चलता चल,
तेरा ही तो है आज और कल।

गिर कर उठना है तो उठ, यही तो जीवन का सार है,
हर ज़ख्म ही तो बताता है, कितना समझदार है।

कंक्रीट तो एक दिन खुद ही मिट्टी हो जाएगी,
पर तेरी खुशबू से ही, ये दुनिया महक जाएगी।

इसीलिए कहता हूँ, बस फूल बनके खिलना है।

-देवकी नन्दन
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6 घंटे पहले

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