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कर्मयोग संग धर्मयोग -देवभूमि

                
                                                         
                            केदारनाथ खड़ा है बर्फ में, न झुका न टूटा,
                                                                 
                            
सोमनाथ गिरा-उठा, पर श्रद्धा से न छूटा।
पत्थर के मंदिर स्थिर और अडिग।
कुछ नए बने कुछ सुधारे गए।
देवभूमि वहीं की वहीं I
पुराना पुल बिना शोर के चल रहा,
पुराना स्कूल बिना दिखावे के पढ़ा रहा।
बिना नाम के कुएँ, बिना प्रचार के रास्ते -
नाम मिट गए, पर छाँव आज भी दे रहा।

बजट का हिसाब कागज़ पर पूरा मिल जाता है,
धरातल पर शायद कुछ धुंध रह जाती है।
हो सकता है रास्ते में कहीं खो जाता हो।

पहले शिष्य गुरु को ढूँढता था,
एक शब्द के लिए कोसों चलता था।
आज शायद गुरु भीड़ में शिष्य को तलाशता है,
और शिष्य खुद को भीड़ में।
समय बदला है, पर तलाश वही है।

पहले शिक्षक समाज का हिस्सा था,
ऋषि-मुनि वाली परंपरा शायद आज थोड़ी दूर हो गई।
कर्म से जुड़ेंगे, धर्म को समझेंगे,
तभी तो देवभूमि की खुशबू बनी रहेगी।

पहले फूल की माला सब मिलकर चढ़ाते थे,
एक धागे में बँधे होते थे।
एक परिवार, एक माला सी बात थी।
आज शायद हर कोई अपना-अपना फूल लाता है,
धागा कमजोर पड़ गया हो।
माला का चढ़ाव कम हुआ,
जैसे फूल अलग-अलग, वैसे मन भी अलग-अलग।
पहले पूजा प्रार्थना थी,
आज शायद लेन-देन सा लग जाता है।
वो तो बिना माँगे देता है,
हम माँगकर शायद उसे छोटा कर देते हैं।

पहले देवताओं से शांत रूप का दर्शन माँगते थे,
दर्शन में ही सुकून मिल जाता था, सब में समभाव थाI
आज शायद रौद्र रूप की बात ज्यादा होती है,
जैसे अग्नि परीक्षा के बिना मान्यता ही न हो।
पिता से पिता होने का प्रमाण कौन माँगे?
जो जितना शांत, उतना ही कृपालु होता है।
रौद्र में शायद दंड मिले, शांत में कृपा।
देवता भी तो कहते हैं - जैसा करोगे, वैसा पाओगे।
मंदिर में जाकर शांति माँगेंगे, तो शांति मिलेगी।
जो चाहेंगे, वही लौटकर आएगा।

पहले न्याय चौघान में होता था,
देवता के खुले आँगन में, अग्नि को साक्षी मानकर।
सब सुनते थे, सब मानते थे।
आज शायद फैसले बंद कमरों में सिमट गए,
पंचनाम वाले फैसले अब सीमित से हो गए।
तब बात बन जाती थी।
न्याय शायद खुले मन से, खुले आँगन में ही सुहाता है।

पहले माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ था,
उनके चरणों में ही स्वर्ग बसता था।
आज शायद समय की कमी हो गई,
और हैप्पी मदर्स डे की एक पोस्ट से काम चल जाता है।
कर्तव्य के रास्ते पर चलेंगे,
तो न्याय का रास्ता भी आसान हो जाएगा।
जिस घर में माँ खुश है,
उस घर में देवता भी शायद मुस्कुराते हैं।

पहले गाँव का मुखिया सबका अपना था,
सुख-दुख में सबके साथ खड़ा रहता था।
चौपाल सजती थी, बातें सुलझ जाती थीं,
बिना कागज़ के भी धर्म का पलड़ा भारी रहता था।
आज शायद काम ज्यादा, समय कम हो गया,
चौपाल की जगह फाइल ने ले ली।
मुखिया पिता तुल्य था,
आज शायद पद की जिम्मेदारी ज्यादा हो गई।
पर भाव वही रहे, तो सब अपना लगेगा।

राम ने धर्म की बात की, कृष्ण ने कर्म का गीत गाया।
दोनों साथ हों, तो रास्ता अपने आप बन जाए।
अलग-अलग हों, तो शायद भटकाव रह जाए।

जिसका रोजी-रोटी का प्रसाद मिलता है,
वो शायद भीड़ में खो जाता है।
प्रसाद का संदेश फोन पर आ जाता है,
पर कर्म का रास्ता शायद जाम में रह जाता है।

मैं देता हूँ कहने से पहले,
शायद याद आ जाए - सब जनता का ही है।
कोई दाता नहीं, सब सेवक हैं।
कोई बड़ा नहीं, सब अपना हैं।

मंच मिले तो मैं की आवाज़ ऊँची हो जाती है,
जिस कुर्सी का मान मिलता है, वो शायद सेवा माँगती है।

पत्थर भी इतना ही कहते हैं -
हमने किया, नाम नहीं माँगा।
छाँव दी, हिसाब नहीं माँगा।

सेवा पहले, सेल्फी बाद में।
काम पहले, भाषण बाद में।
हम पहले, मैं बाद में।
समर्पण पहले, मोलभाव बाद में।
जुड़ाव पहले, टूट बाद में।
चौघान पहले, बंद कमरा बाद में।
शांति पहले, रौद्र बाद में।
माँ का आँचल पहले, वृद्धाश्रम बाद में।
चौपाल पहले, टेंडर बाद में।

बैनर पुराने हों तो क्या,
छत पक्की हो जो सबको छाँव दे।

देवभूमि तब देवभूमि लगेगी,
जब हर कदम पर कर्म होगा,
हर साँस में धर्म होगा।
कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब अपने होंगे।
एक माला, एक परिवार, एक देवभूमि।
खुला न्याय, खुला आँगन, खुला मन।
कर्तव्य के पथ पर चलते पैर।
सेवक भाव वाला हर मन।

बुरे कर्म से बच गए, तो आधी राह आसान।
अच्छे कर्म कर लिए, तो बची राह भी आसान।I

यही कर्म है। यही धर्म है। यही अपनापन है ।
- देवकी नन्दन गहतोड़ी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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