सुनो, एक दिन प्रकृति ने अदालत लगाई,
सबको बुलाया, सबकी अकड़ दिखायी।
समुंदर आया, अकड़ के बोला -
मैं सबसे बड़ा, मुझमें सारा पानी,
सारी नदियाँ आकर मुझमें गिरती हैं,
मुझसे बड़ा कोई नहीं, यही मेरी कहानी।
प्रकृति हँसी, बोली - तू बड़ा तो है,
पर खारा है, किसी की प्यास नहीं बुझाता,
एक छोटी सी नदी, मीठा पानी पिलाती है,
तू तो किनारे बैठे प्यासे को भी तरसाता है।
फिर पहाड़ आया, सीना तान के -
मैं एवरेस्ट हूँ, सबसे ऊँचा हूँ,
बादल मेरे नीचे, मैं आकाश छूता हूँ।
प्रकृति बोली - ऊँचा तो तू बहुत है,
पर अकेला है, तेरे ऊपर कुछ नहीं उगता,
तेरी छाती चीर कर, एक छोटा सा पीपल उगता है,
वही तेरी अकड़ को, धीरे-धीरे तोड़ जाता है।
फिर सूरज आया, गरमी दिखा के -
मैं ही रोशनी, मैं ही दिन लाता हूँ,
मेरे बिना सब अंधेरा, मैं ही चमकाता हूँ।
एक छोटा सा बादल आया, धीरे से बोला -
भाई, थोड़ा थम जा, थोड़ा आराम कर,
दो मिनट मुझे भी चमकने दे,
तू हर वक्त चमकेगा, तो मेरी क्या कदर?
और अंत में हवा आई, तूफान बन के -
मैं सब उड़ा दूँगी, पेड़, मकान, सब गिरा दूँगी।
सामने एक छोटा सा दिया जल रहा था,
हवा ने लाख कोशिश की, पर बुझा नहीं पाई,
क्योंकि दिया जिद पर था, जलने की कसम खाई थी।
फिर प्रकृति ने फैसला सुनाया -
सुनो सब, अकड़ किसी की नहीं टिकती,
समुंदर भी सूखता है, पहाड़ भी झुकता है,
सूरज भी ढलता है, हवा भी थम जाती है,
बस वही रहता है, जो झुकना जानता है।
फल झुकता है, तो लोग उसे खाते हैं,
पेड़ झुकता है, तो पंछी घर बनाते हैं,
नदी झुकती है, तो समुंदर बन जाती है,
और घमंड... वो तो बस राख बन कर उड़ जाता है।
-देवकी नन्दन
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