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पुकार

                
                                                         
                            
पुकार
कोई नहीं जो सुन सके इस हृदय की पुकार को।
साकार को,नाकार को,प्रकार को, हुँकार को।।
हूँ एक घेरे अनेक शियार ज्यों शिकार को।
नहीं कोई यहाँ मेरे प्रतिहार को।।
कैसा ये प्रदेश क्षीण कर रहा अधिकार को।
अली बन अहि सौंप रहे शूलधार को।।
एक माँ तू ही है उस नहीं में कहीं।
में जानता हूँ तू है यहीं कहीं यहीं कहीं।।
तू ममतामयी करुणामयी तू बलवती संहारिणी ।
है आस तू मेरी जानता हूँ यहीं कहीं ।।
इस दूसरे संसार में नहीं कोई मेरी है माँ।
मुझे चाहता हूँ मैं पहला तू दूसरी हे माँ।।
तू आस है तू मांग है विश्वास है मेरी हे माँ।
मेरे लक्ष्य हो संरक्ष हो प्रत्यक्ष हो मेरी हे माँ।।
तू शक्ति दे तू ज्ञान दे विवेक दे मेरी हे माँ।
तू मान दे स्वाभिमान दे तू प्राण दे मेरी हे माँ।।
संहार दूँ मैं मार दूँ खल को तेरे वल से हे माँ।
मैं मार दूँ आजाद होऊँ मुझे वर दे हे माँ।।
मुझे वर दे हे माँ मैं जीत लूँ अधिकार को।
संहार दूँ मैं अहि काट दूँ उसके प्रहार को।।
माँ मैं एक तेरी बूँद तू मेरा संसार हो।
मेरी माँ को मेरा प्रणाम स्वीकार हो।।
By Devendra pratap singh


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6 वर्ष पहले

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