श्री गणेशाय नमः
फूल और भँवरा
दो चार दिन की बस बात ये तो,
फिर रोज अश्कों की बरसात होगी।
जब तक न मिलता तुझे कोई अपना,
बनकर रहेगी तू बस प्रेमरोगी।।
फिर उसकी गलियों में जा जाके एक दिन,
सोचेगी उसको मिली कोई होगी।
अश्कों से अश्कों का मिलना हुआ बस,
सोचेगी बस अबके बरसा ना होगी।।
बीतेंगे दिन,रात, मौसम कई फिर,
फिर गर्मी में ठंडी हवाएं चलेगीं।
मिलेगीं निगाहें दिल भी मिलेगा,
सोचेगी बस अबके बरसा ना होगी।।
ठंडी हवाएं और फूलों पे भँवरा,
सबसे हसीं तुझे दुनिया लगेगी।
दो चार दिन फिर चला अबके मौसम,
इस बार घनघोर बरसात होगी।।
कली थी तू पगली,खेले थे भँवरे,
भूली बाद गर्मी के बरसात होगी।
पत्ते तो चलते हैं पानी पे अक्सर,
बूँदें ना पत्तों पे ठहरी रहेंगी।।
पत्ता क्यों बनती है,बन जा तू नदिया,
पहले पानी भरेगा फिर तू मरेगी।
फिर गर्मी में दो रोज देखेगी धरती,
पर जन्मों जनम फिर कहानी चलेगी।।
By Devendra pratap singh
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