क्यों खुदा मिलता नहीं
तू लफ्ज है,अल्फाज है तू गूँजता है हर कहीं।
तू आब है,तू आग है गिरता कहीं,उठता कहीं।।
तू आम है या राज है खोता नहीं पाता नहीं।
जानता हूँ है यहीं तो क्यों खुदा मिलता नहीं।।
तू दिल में है या दिल ही है,कैसे कहूँ जानू नहीं।
लाखों खुदा हैं नाम के तेरे सिवा मानू नहीं।।
साहिल बने तूफान भी कैसे करे जानू नहीं।
इधर भी तू उधर भी है मैं किस तरफ जानू नहीं।।
पर्दा करूँ,परखा करूँ तुझे किस तरहा जानू नहीं।
ऐसा न हो मिल जाये तू मैं पारखी मानु नहीं।।
एक रौशनी दिखला भी दे,कुछ जुग्नुएं चमका भी दे।
है रात,रात काली सी कुछ जलबे तू दिखला ही दे।।
मैं थक चुका, हारा नहीं दुश्मन से तू मिलवा भी दे।
हो तीर मेरे सीने में तू सामने दिखलाई दे।।
मरकर मिले जो तू खुदा मरना मुझे सिखला भी दे।
या मार दे खुद ही मुझे जलबा अता फरमा ही दे।।
By Devendra pratap singh
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