फिर से एक बार वही याद पुरानी आई,
अपने माज़ी की भूली वो कहानी आई ।
वो लम्हे जो कभी साथ गुज़ारे थे हमने,
उन्हीं लम्हों की वो याद-ए-दहानी आई।
बाद-ए-मुद्दत फिर तुम से मुलाकात हुई,
बात अहदे-वफ़ा की भुलानी याद आई।
तुमको पाने के लिए दीवाने होते थे कभी,
तुम्हारी करते थे जो बखानी याद आई।
वक्त के साथ सब ज़ख़्म भी भर जाते हैं,
तुम्हें देखा ज़ख़्मों की निशानी याद आई।
"शमीम" रास्ते और मंज़िलें अपनी जुदा हैं,
भुलाकर फिर बाद-ए-ख़िज़ानी याद आई।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X