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मिली नज़र; हुआ नशा मुझ को।

                
                                                         
                            वफ़ा करता हूँ; दे वफ़ा मुझ को,
                                                                 
                            
हाले-दिल सुन और सुना मुझ को।

तेरे इन गेसू-ए-सियाह के साए में,
कुछ और देर दे आसरा मुझ को।

तेरी आँखें छलकते हुए पैमाने हैं,
मिली नज़र; हुआ नशा मुझ को।

क्या सबब है तेरी ख़ामोशी का,
कशीदगी है क्या बता मुझ को।

हमें दीवाना बनाता है अंदाज़ तेरा,
दिल पे तीरे-नज़र लगा मुझ को।

मेरी मंज़िल तू ही तो है "शमीम",
नसीब अच्छा है तू मिला मुझ को।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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44 मिनट पहले

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