वफ़ा करता हूँ; दे वफ़ा मुझ को,
हाले-दिल सुन और सुना मुझ को।
तेरे इन गेसू-ए-सियाह के साए में,
कुछ और देर दे आसरा मुझ को।
तेरी आँखें छलकते हुए पैमाने हैं,
मिली नज़र; हुआ नशा मुझ को।
क्या सबब है तेरी ख़ामोशी का,
कशीदगी है क्या बता मुझ को।
हमें दीवाना बनाता है अंदाज़ तेरा,
दिल पे तीरे-नज़र लगा मुझ को।
मेरी मंज़िल तू ही तो है "शमीम",
नसीब अच्छा है तू मिला मुझ को।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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