तुमसे अब तो हमें प्यार नहीं,
और ये दिल भी सोगवार नहीं।
हम भी बदल गए तुम्हारी तरह,
चैन-ओ-सुकूं है, बेक़रार नहीं।
जी रहे हैं बहुत मज़े में हम भी,
अब हम तुम्हारे तलबगार नहीं।
उलझ कर जिसमें बेख़ुदी हुई,
वो ख़ुशबू-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार नहीं।
तुम्हें भुला दिया है अरसा हुआ ,
तुम्हारी यादें ख़ुश-गवार नहीं।
और भी फूल खिलेंगे चमन में,
जो गई आख़िरी बहार नहीं।
फिर कोई दामन थाम लेंगे हम,
बिन तुम्हारे तो हम बेज़ार नहीं।
और भी मरहले हैं रहे-ज़िन्दगी में,
"शमीम" इतना दिल-अफ़गार नहीं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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