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तू ही मेरी मंज़िल

                
                                                         
                            तू ही मेरी मंज़िल तू ही रास्ता है,
                                                                 
                            
तू ही हमसफ़र है तू ही रहनुमा है।

नज़र आते हैं दिलनशीं ये नज़ारे,
तेरा साथ है ख़ूबसूरत फ़िज़ा है।

है रौशन-ओ-आबाद मेरा जहान,
हरेक लम्हा मेरा मसर्रत भरा है।

अब इसके सिवा और क्या चाहिए,
मेहरबाँ तेरी निगह-ए-फ़ित्न-ए-ज़ा है।

ख़ुद अपनी ख़बर भी नहीं है मुझे,
तेरी मदभरी आँखों का ये नशा है।

समाँ काश ये ठहर जाए "शमीम"
मेरे रू-ब-रू हसीन चेहरा तेरा है।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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एक घंटा पहले

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