हर चेहरे पर ये जाने कैसा रंग भर गया,
लगता है हरेक आँख का सपना बिखर गया।
हर सिम्त उदासी है, सभी हैं यहां तन्हा,
वो जोश-ए-ज़िन्दगी न जाने किधर गया।
इन्सान पर इन्सान का है ज़ब्र हर तरफ,
लगता है इस बस्ती का हर इन्सान मर गया।
इन पत्थरों को जानता हूं ये न पिछलेंगे,
इनकी इबादत हो सके अब वो असर गया।
अब्र-ए-गुरेजां की तरह अब इनक़लाब भी,
बरसा नहीं; इस राह से होकर गुज़र गया।
अनवार-ए-मेहर-ओ-माह में असर नहीं "शमीम",
ये देहर अब तारीकी-ए-सितम से भर गया।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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