बस नहीं चलता कोई दिले-बे-इख़्तियार पर,
यूँ ठहर जाती है नज़र आप के रुख़सार पर।
आप से मिलने की हसरत और इंतज़ार है,
दिल है बेक़रार कब से तालिब-ए-दीदार पर।
इस क़दर ग़ुम रहते हैं हम आपके ख़यालों में,
आपकी सूरत नज़र आई दर-ओ-दीवार पर।
आप के आ जाने से फूल खिल गए चमन में,
आप का शबाब ही तारी है इस बहार पर।
साथ न छूटे कभी अपना ये सारी उम्र भर,
हम को है तस्कीन आपके ही दारोमदार पर।
शर्म से आँखें झुकीं तो हुस्न भी निखर गया,
नूर और भी है ज़्यादा आपके रुख़सार पर।
आप पर ही हम दिल-ओ-जाँ निसार करते हैं,
हैं "शमीम" हम फ़िदा इस हुस्न की बहार पर।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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