मांगने की मेरी फ़ितरत तो नहीं,
सर झुकाना मिरी आदत तो नहीं।
किसी इंसाँ को फरिश्ता बना दूं,
ऐसी कोई भी ज़रूरत तो नहीं।
लोग इक पल.में बदल जाते हैं,
टूट जाते हैं दिल हैरत तो नहीं।
बहुत कम लोगों से मिलता हूँ मैं,
मिरी ये क़ैफ़ियत ख़ल्वत तो नहीं।
पाप कर के रब को सर झुकाना,
इक फ़रेब है ये इबादत तो नहीं।
ये दौर तो है तिजारत का "शमीम",
दिलों में जज़्बा-ए-उल्फ़त तो नहीं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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