एक इंसान हूँ मैं ऐब-ओ-हुनर रखता हूँ,
हक़ीक़त ख़ुद की पेश-ए-नज़र रखता हूँ।
ज़मीं पर रहता हूँ मैं ये जानता हूँ मगर,
आसमाँ छूने को बाल-ओ-पर रखता हूँ।
नहीं सीखा कभी बातें बड़ी बड़ी करना,
इसीलिए बात को मैं मुख़्तसर रखता हूँ।
तवील राहगुज़र है ये ज़िन्दगी का सफ़र,
साथ अपने कम रख़्त-ए-सफ़र रखता हूँ।
जिए जाता हूँ ज़िन्दगी बड़ी बेफ़िक्री से,
मैं रब के वास्ते तस्लीम-ए-सिपर रखता हूँ।
"शमीम" राब्ता हर मिलने वाले से है मिरा,
साथ अपने मोतबर, ना-मोतबर रखता हूँ।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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