कोई हसरत नहीं खुशी ही नहीं,
जिन्दगी जैसे ज़िन्दगी ही नहीं।
जाम खाली है प्यास होंठों पर,
वो मैकदे नहीं मैकशी ही नहीं।
है ज़िंदगी मेरी तन्हाइयों भरी,
कोई ताबीर भी मिली ही नहीं।
बिछड़कर तुझ से तन्हा यूँ रहे,
मेरी दुनिया कभी बसी ही नहीं।
सुकूत ही है चार सू बेइन्तिहा
मेरी क़िस्मत में रौशनी ही नहीं।
तेरे बग़ैर तो ये हाल है "शमीम"
समन्दर तो है तिश्नगी ही नहीं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X