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अहले-जहाँ

                
                                                         
                            दुनिया में अब इन्सान की क़ीमत नहीं रही।
                                                                 
                            
लोगों की फ़ितरत में भी मुरव्वत नहीं रही।

डरते नहीं अब अहले-जहाँ गुनाह करने से,
दिल में किसी के रब की अक़ीदत नहीं रही।

मोहब्बत प्यार और वफ़ा बेमानी से हो गए,
इन रिश्तों को निभाने की शिद्दत नहीं रही।

हालात हुए हर तरफ नफ़रत और जंग के,
अम्नो-अमाँ की अब कोई सूरत नहीं रही।

देने की नहीं हम को बस पाने की हसरत है,
और कहते हैं कि रब की इनायत नहीं रही।

"शमीम" यूँ तो मुस्कुरा कर मिलते हैं सभी से,
हमसे किसी को कोई भी निस्बत नहीं रही।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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एक दिन पहले

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