तुझ को पाकर हासिल जैसे हर ख़ुशी कर ली,
दिये उम्मीदों के जलाए और रौशनी कर ली।
ख़यालों में सजाकर तुझ को जो लिखा हम ने,
लोग ये कहने लगे कि हम ने शायरी कर ली।
आँखों आँखों में जो कुछ हम से तू ने कहा,
इशारों में ही अपने दिल की बात भी कर ली।
तेरे ख़यालों में हर वक़्त रहते हैं बेख़ुद हम,
जब से मोहब्बत हुई आशुफ़्ता-सरी कर ली।
ख़फ़ा न होना तुम हम को मुआफ़ कर देना,
शरारत हम ने अगर जान-ए-जाँ कभी कर ली।
तेरे सिवा तो हमें और कुछ न चाहिए "शमीम",
तेरी उल्फ़त मिली हासिल-ए-ज़िंदगी कर ली।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X