आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शाम को वो बस में घर लौटती है

                
                                                         
                            औरतें अब भी समय से पहले बड़ी हो जाती हैं,
                                                                 
                            
भाइयों के बाद, थोड़ा कम खाना खा लेती हैं।

स्कूल में फर्स्ट आई तो सबने ताली बजाई,
फिर कहा - अब घर संभालो, बहुत पढ़ाई हो गई।

दफ्तर में उसकी कुर्सी तो है,
पर उसकी बात के लिए जगह नहीं है।

शाम को वो बस में घर लौटती है,
एक हाथ में बैग, एक हाथ में खुद की इज्जत संभालती है।

वो थकती नहीं है, ऐसा हम मान लेते हैं,
वो रोती नहीं है, ऐसा हम समझ लेते हैं।
-देव कुमार पटेल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर