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आदमी होने की कसरत

                
                                                         
                            भीड़ बहुत है, पर आदमी कम हैं,
                                                                 
                            
हर हाथ में फोन, पर बातें कम हैं।
छतें ऊँची हो गईं, दिल छोटे हो गए,
रिश्तों के धागे, नोटों में खो गए।

एक तरफ थाली में खाना फेंका जाता है,
एक तरफ बच्चा भूखा सो जाता है।
एक तरफ शादी में लाखों के फूल हैं,
दूसरी तरफ कर्ज़ में डूबे स्कूल हैं।

हम मंदिर-मस्जिद पर लड़ तो लेते हैं,
पर कूड़े के ढेर पर आँखें मूँद लेते हैं।
धर्म की बात पर खून खौल जाता है,
अन्याय देखकर वही खून सो जाता है।

सच बोलने वाला अब अकेला लगता है,
झूठ का शोर ही मेला लगता है।
जो चुप है, वो भी तो दोषी है यहाँ,
ताली बजाना भी तो साज़िश है यहाँ।

चलो, फिर से आदमी बनना सीखें,
गिरे हुए को उठाना सीखें।
दीवारें नहीं, पुल बनाना सीखें,
सिर्फ खुद के लिए नहीं, सबके लिए जीना सीखें।
-देव कुमार पटेल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

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