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नया भारत, पुराने सवाल"

                
                                                         
                            "नया भारत, पुराने सवाल"
                                                                 
                            

कागज़ पर सबका विकास लिखा है,
ज़मीन पर अब भी पसीना बिका है।

बेटी पढ़ाओ का नारा तो गूँज रहा है,
बस स्टॉप पर अब भी वो डर से जूझ रहा है।

किसान के बेटे ने कोटा की तैयारी की,
खेत ने फिर इस साल भी गद्दारी की।

अस्पताल चमक रहे हैं, बोर्ड बड़े हैं,
अंदर दवाइयों के रैक आज भी खड़े हैं - खाली।

हम सबको जज बनने की जल्दी है,
सुनने की फुर्सत अब किसे बची है?

सच ये नहीं कि देश बदल नहीं रहा,
सच ये है कि हम बदल नहीं रहे।
-देव कुमार पटेल
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एक घंटा पहले

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