धोखा, सत्य और सुकून
धोखा मिला तो दर्द हुआ,
सत्य मिला तो आँखें खुलीं,
और जब सत्य को स्वीकार किया,
तब जाकर साँसें कुछ सहज हुईं।
मैं सोचता रहा—
आख़िर धोखा इतना दर्द क्यों देता है?
शायद इसलिए...
क्योंकि धोखा सिर्फ़ विश्वास नहीं तोड़ता,
वह उस कहानी को भी तोड़ देता है
जो हमने किसी के साथ
अपने मन में लिखी थी।
हमने जिसे अपना समझा,
वह अपना था ही नहीं—
यह जानना जितना कठिन है,
उससे भी कठिन है
यह स्वीकार करना कि
हमने उसे अपना मानकर
अपने ही दिल को समझाया था।
सत्य कभी-कभी तलवार जैसा होता है,
एक ही वार में
कई भ्रम काट देता है।
सत्य कहता है—
“जिसे जाना है, उसे जाने दो।”
“जिसे बदलना नहीं, उसे बदलने की ज़िद मत करो।”
“जिसने तुम्हें धोखा दिया,
उसके झूठ को अपनी ज़िंदगी का सच मत बनाओ।”
और फिर...
एक दिन हम थककर
लड़ना बंद कर देते हैं।
न उससे कोई शिकायत रहती है,
न खुद से कोई सवाल।
बस मन धीरे से कहता है—
“हाँ, जो हुआ... वह हुआ।”
यही वह क्षण है
जहाँ सत्य
दर्द से निकलकर
सुकून बन जाता है।
सुकून का अर्थ
यह नहीं कि हमें दर्द नहीं है।
सुकून का अर्थ है—
दर्द अब हमें चलाता नहीं।
हम याद करते हैं,
मगर टूटते नहीं।
हम रोते हैं,
मगर किसी को दोष नहीं देते।
हम अकेले होते हैं,
मगर अपने भीतर
खाली नहीं होते।
तब समझ आता है—
धोखा हमें तोड़ने नहीं आया था,
वह हमें हमारी
अपनी पहचान दिखाने आया था।
सत्य हमें हराने नहीं आया था,
वह हमें भ्रम से मुक्त करने आया था।
और सुकून...
सुकून कहीं बाहर मिला ही नहीं।
वह तो उसी दिन पैदा हुआ
जिस दिन हमने
दूसरों से नहीं,
अपने आप से सच बोलना शुरू किया।
अब न धोखे से डर है,
न सत्य से शिकायत।
क्योंकि मैंने जान लिया है—
धोखा एक अनुभव है,
सत्य एक जागृति है,
और सुकून...
उस जागृति के बाद
मिली हुई ख़ामोशी है।
- देव कुमार पटेल
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