वो गाँव से शहर एक सपना लेकर आया था,
जेब में थोड़ा सा किराया लेकर आया था।
यहाँ डिग्रियों के जंगल हैं, नौकरी का सूखा है,
हर ऑफिस के बाहर, उम्मीदों का भूखा है।
बारह घंटे मशीन बना देती है,
महीने के आखिर में, इंसान बना देती है।
मालिक कहता है - तू लकी है, तुझे काम मिला है,
वो नहीं देखता, काम ने तुझसे क्या छीन लिया है।
गाँव में उसकी माँ अब भी कहती है,
मेरा बेटा शहर में साहब बन गया है।
और साहब यहाँ, टिफिन के ठंडे खाने को
गरम करने के लिए, माइक्रोवेव ढूंढ रहा है।
-देव कुमार पटेल
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