वक़्त आईना दिखाता है…
बेवजह किसी को सताकर
अगर तुम्हें सुकून मिलता है,
तो ज़रा अपने भीतर झाँकना—
कहीं तुम्हारा ज़मीर
तुमसे नाराज़ तो नहीं…?
थोड़ी-सी ताक़त क्या मिली,
तुमने ख़ुद को ख़ुदा समझ लिया;
भूल गए कि इंसान की असली पहचान
उसकी हैसियत से नहीं,
उसके किरदार से होती है।
आज किसी की ख़ामोशी को
उसकी कमज़ोरी समझकर हँस रहे हो,
किसी के आँसुओं को
अपनी जीत समझकर इतराते हो…
मगर याद रखना—
जिस दिल को तुमने बेवजह दुखाया है,
उसकी आह का रास्ता
तुम्हारी सोच से कहीं लंबा होता है।
किसी को गिराकर
अपने क़द का अंदाज़ा मत लगाना,
ऊँचा वही होता है जनाब
जो किसी गिरे हुए को
हाथ देकर उठा दे।
दूसरों के ज़ख़्मों पर
नमक छिड़कने वालों को
शायद आज कोई रोकता नहीं,
मगर वक़्त…
वह सब देखता है,
सब लिखता है,
और फिर एक दिन
बिना आवाज़ किए हिसाब कर देता है।
आज तुम्हारे पास
किसी को रुलाने की ताक़त है,
तो कल उसी ताक़त के सामने
तुम्हारी अपनी आँखें भीग सकती हैं।
क्योंकि ज़िंदगी का दस्तूर बड़ा अजीब है—
जो दर्द तुम बाँटते हो,
वही किसी मोड़ पर
तुम्हारा पता पूछता हुआ लौट आता है।
इसलिए किसी के दिल को
अपनी जीत का मैदान मत बनाना,
किसी की मजबूरी को
अपनी ताक़त मत समझना…
वक़्त बहुत ख़ामोश है, जनाब,
मगर उसका हिसाब बहुत गहरा है।
और जब वह आईना दिखाता है ना…
तो चेहरा नहीं दिखता—
इंसान को उसका असली किरदार दिखाई देता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X