बिसात बिछाने वालों, आईना साथ रखना
बीमार हैं तो बीमार ही दिखेंगे,
हर दर्द को मुस्कान से छुपाएँ कैसे?
तुमने चेहरे पर रंग तो चढ़ा दिया,
मगर आँखों से सच मिटाएँ कैसे?
रिश्ते बढ़ते रहे दिन-ब-दिन,
फिर जाने क्यों फ़ासले बढ़ते गए,
जिन्हें अपना समझकर दिल दिया,
वही रिश्तों के हिसाब गिनते गए।
हमने तो हर ज़ख़्म को
ख़ामोशी से सहला लिया,
किसी से मरहम माँगा नहीं,
बस ख़ुद को ख़ुद से संभाल लिया।
कुछ लोग सामने बहुत अपने होते हैं,
पीछे मगर किरदार बदल लेते हैं,
लबों पर मिठास लिए घूमते हैं,
और वक़्त पड़े तो रिश्ते निगल लेते हैं।
हमने भी माना—
हममें कमियाँ हैं,
हम भी हर जगह सही नहीं;
मगर अपनी कमियों को छुपाकर
किसी और की अच्छाई पर
इल्ज़ाम लगाना सीखा नहीं।
तुम चाल चलो,
बिसात बिछाओ,
मोहरों को रिश्तों का नाम दो—
हमने तो इंसान समझकर
हर चेहरे को सलाम किया है।
फ़र्क़ बस इतना है—
तुम्हें जीतने की जल्दी रही,
हमें रिश्ते बचाने की फ़िक्र रही।
तुमने लोगों को मोहरा समझा,
हमने हर इंसान में
एक दिल देखा।
इसलिए ऐ
शकुनि जैसी सोच रखने वालों—
दूसरों के किरदार पर
उँगली उठाने से पहले
एक बार अपने हाथ भी देख लेना;
कहीं उन उँगलियों पर
किसी के भरोसे का ख़ून तो नहीं?
और हाँ...
बिसात बिछाने वालों,
आईना साथ रखना।
क्योंकि दुनिया को
बहुत देर तक बहकाया जा सकता है,
मगर आईने को नहीं।
वो न तुम्हारी बातों से प्रभावित होगा,
न तुम्हारी मुस्कान से,
न तुम्हारी चालाकी से—
वो बस
तुम्हारा चेहरा नहीं,
तुम्हारा किरदार दिखाएगा।
और जिस दिन
इंसान को अपना असली चेहरा दिख जाए,
उस दिन
दूसरों को गुनहगार ठहराने की
ज़रूरत ख़त्म हो जाती है।
हम आज भी वही हैं—
दिल साफ़ रखते हैं,
इसलिए अकेले पड़ जाएँ तो पड़ जाएँ;
मगर किसी की पीठ पर वार करके
अपनी जीत का जश्न
कभी नहीं मनाएँगे।
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