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मोम का इश्क़

                
                                                         
                            इश्क में लड़कों को ही अब मोम होना पड़ता है,
                                                                 
                            
हँस के महफ़िल में अकेले में ही रोना पड़ता है। 

जो थे लापरवाह बेहद अपनी धुन के पक्के थे,
तोड़ के अपनी ही ज़िद को उनको रहना पड़ता है।

अपनी ज़िद अपनी अना, था जो लड़कपन अपना पर,
इश्क़ की ख़ातिर ही वो सब हमको खोना पड़ता है। 

रहते थे हर दम अकड़कर जो बहारों की तरह,
ख़ाक में मिलकर उन्हें अब नर्म होना पड़ता है।

जो परिंदे उड़ते थे आज़ाद हो अफलाक में,
ओट में पत्तों की छुप कर उनको रोना पड़ता है। 
– दीपक 'अलक' 
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1 hour ago

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