मुझे अच्छी तरह मालूम है, पैसा यहाँ क्या है
मगर ये भी पता है मुझको क़ीमत में ज़ुबाँ क्या है
ये दुनिया राज़ है गहरा जिसे कोई नहीं समझा
अभी है खोज में इंसान दुनिया में कहाँ क्या है
जवां है जब तलक तू तेरी क़ीमत है रकीबो में
बुढ़ापा ही बताएगा कि तेरी दास्तां क्या है
बहुत आसान लगता है ग़ज़ल कहना, नए शायर
मगर ये जान ले पहले ज़बां क्या है बयां क्या है
वो अपनी मंज़िले मक़सूद ख़ुद ही ढूंढ लेते हैं
जुनूं वालों की नज़रों में ज़मीं क्या आसमां क्या है
नज़र उसकी उतारे, और बलाएं कौन ले उसकी
वो जिसकी मां नहीं पूछो कबीरा उससे माँ क्या है
-कबीर हालाती "कबीरा"
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