पंचतत्व निर्मित मानव तन, मिट्टी में मिल जाना है।
बचा हुआ जो कुछ भी होगा, गंगा में घुल जाना है।।
फिर काहे का राग द्वेष भर, रिश्तों को बरबाद करें।
आज़ नहीं तो कल सांसों की, डोरी को खुल जाना है।।
बांसो वाला होगा बिस्तर, चादर चंद चढ़ाएंगे।
राम नाम का कर उच्चारण, अग्नि सेज ले जाएंगे।।
फिर घमंड कैसा है मानव, जब सब कुछ जल जाना है।।
आज़ नहीं तो कल सांसों की, डोरी को खुल जाना है।।
कितना समय मिला है किसको, नहीं यहां कोई जाने।
कौन याद रखता है किसको, नहीं वहां कोई जाने।।
चढ़ी जवानी आज़ सभी की, एक दिवस ढल जाना है।
आज़ नहीं तो कल सांसों की, डोरी को खुल जाना है।।
बस कर्मों का जोड़ घटाना, हाथ नहीं कुछ भी अपने।
जायेंगे सत्कर्म संग बस बाकी सब केवल सपने।।
जिसने सत्कर्मों को साधा, पुनर्जन्म फ़ल पाना है।।
आज़ नहीं तो कल सांसों की, डोरी को खुल जाना है।।
हंसी खुशी में सभी बिताओ, जीवन का हर इक इक पल।
जो भी करना आज़ करो, है आता नहीं कभी भी कल।।
दुःख सुख सिक्के के दो पहलू, आना है टल जाना है।
आज़ नहीं तो कल सांसों की, डोरी को खुल जाना है।।
-दीप चंद्र गुप्ता "दीप"
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