भटक आया आज फिर वो बाज़ार की सड़कों पे
भूख मिटाने का बोझ टांगे हुए अपने कंधों पे
सोच के निकला था आज तो दो वक्त की रोटी कमा कर लाऊंगा
क्या पता था कि ठोकरें खा कर वापिस आऊंगा
खाली जेब देख कर घर लौटने की हिम्मत न हुई
क्या कहूंगा बच्चों से की आज फिर कुछ भी कमाई न हुई
समझ नहीं आता कि भगवान की बनाई इस दुनिया में इंसान तो है पर इंसानियत क्यों नहीं
किसी का दुख दर्द महसूस कर सके ऐसा किसी के पास दिल ही नहीं
आज मेरा बुरा वक्त है तो क्या हुआ कल शायद अच्छा आएगा
मुझे धक्का दे कर भगाने वाले ऊपरवाले को क्या मुंह दिखाएगा
मैं तो दो वक्त की रोटी कमाने निकला था खैरियत की खाने नहीं
गरीब जरूर हूं साहब पर मैं कोई भिखारी नहीं।
गरीब जरूर हूं साहब पर मैं कोई भिखारी नहीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X