आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो स्त्री है

                
                                                         
                            वो पानी की तरह है;
                                                                 
                            
जो कठोर पत्थरों पर भी धारा बनकर बहती है।
हर एक मोड़ से निकलती है,
बहुत से रूप बदल कर।
कहीं साफ तो कहीं मैली,
कहीं नरम तो कहीं उफनति हुई।

पहाड़ों को चीर; संघर्ष करती हुई,
मैदानों के बीच से गुजरती है।
बस एक अस्तित्व की चाह में,
बहती चली जाती है,
और मिल जाती है किसी सागर से।
वो एक स्त्री है
जो दुर्गम राह से भी,
धारा बनकर बह जाती हैं।
अस्तित्व त्याग कर भी;
निस्वार्थ समर्पण सीखा जाती है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर