वो पानी की तरह है;
जो कठोर पत्थरों पर भी धारा बनकर बहती है।
हर एक मोड़ से निकलती है,
बहुत से रूप बदल कर।
कहीं साफ तो कहीं मैली,
कहीं नरम तो कहीं उफनति हुई।
पहाड़ों को चीर; संघर्ष करती हुई,
मैदानों के बीच से गुजरती है।
बस एक अस्तित्व की चाह में,
बहती चली जाती है,
और मिल जाती है किसी सागर से।
वो एक स्त्री है
जो दुर्गम राह से भी,
धारा बनकर बह जाती हैं।
अस्तित्व त्याग कर भी;
निस्वार्थ समर्पण सीखा जाती है।
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