आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोई हिसाब नहीं माँगती।

                
                                                         
                            सुनो प्रिये
                                                                 
                            
अगर कल सब कुछ समाप्त होना है
तो आज कहीं नहीं चलते
न किसी पहाड़ पर
न किसी नदी के उस पार
न उस शहर में
जहाँ रोशनियाँ रात भर
हमारे होने का उत्सव मनाती हैं।

आज यहीं बैठते हैं
इस थोड़ी-सी धरती पर,
इस अनंत आकाश के नीचे
तुम अपना कंधा दे देना मुझे
मैं उस पर सिर रखकर
कुछ देर भूलना चाहता हूँ
कि मुझे कुछ बनना था
कहीं पहुँचना था
किसी से आगे निकलना था
तुम्हारी आँखों में
कल के कोई सपने न हों
मेरी आँखों में
बीते हुए दिनों का हिसाब नहीं
हमारे बीच
न कोई वादा हो
न बिछुड़ने का भय
न फिर मिलने की कोई शर्त
बस तुम हो
मैं हूँ
और ऊपर फैला हुआ आकाश
जिसे हमारी प्रेम-कथा सुनने में
कोई दिलचस्पी नहीं।

देखो न, प्रिये,
वे तारे कितनी शांति से जल रहे हैं
उन्हें कोई पुरस्कार नहीं चाहिए,
न अपनी रोशनी का प्रमाण देना है
और वह चाँद
कितना निश्चिंत है
अपनी अधूरी गोलाई में
क्या हम भी ऐसे नहीं रह सकते?
अधूरे
अप्रमाणित
किसी अंतिम उपलब्धि की प्रतीक्षा से मुक्त?
तुम पूछना मत
कि हमारे प्रेम का क्या होगा
जब हम नहीं होंगे
मैं भी नहीं पूछूँगा
कि इस जीवन का क्या अर्थ है
जब जीवन ही नहीं होगा
आज इन प्रश्नों को
किसी पेड़ की जड़ में रख देते हैं
जहाँ पुराने पत्ते
बिना किसी शोकसभा के
मिट्टी हो जाते हैं
और सुनो
जब मृत्यु आए
तो उसे कुछ देर प्रतीक्षा करने देना
कहना
दो लोग बैठे हैं यहाँ,
अभी इन्होंने
एक-दूसरे से कुछ नहीं माँगा है
अभी इन्होंने
भविष्य के नाम कोई इच्छा नहीं लिखी है
अभी यह आदमी
एक स्त्री के कंधे पर सिर रखे
आकाश देख रहा है
और स्त्री की उँगलियाँ
उसके बालों में
धीरे-धीरे शाम बुन रही हैं
अभी संसार में
कुछ भी जीतना शेष नहीं है
अभी कोई हार
हमारा पीछा नहीं कर रही
अभी साँस है
साँस में तुम्हारी गंध
तुम्हारी गंध में
एक पुराना-सा घर,
और उस घर की खिड़की से
दिखता हुआ
अनंत आकाश।

प्रिये, अगर अंत में
कुछ भी शेष नहीं रहना
तो इस क्षण को
किसी स्मृति की तरह बचाना भी क्यों?
आओ
इसे स्मृति न बनाएँ
इसे बस घटित होने दें
जैसे रात घटित होती है
जैसे चाँदनी
किसी उजाड़ छत पर उतरती है
जैसे कोई नदी
समुद्र में गिरते हुए
अपने जल से
कोई हिसाब नहीं माँगती।

तुम मेरे कंधे पर सिर रख देना
मैं तुम्हारे कंधे पर
और जब आकाश
धीरे-धीरे तारों से भर जाए,
तो हम देर तक चुप रहें
इतने चुप
कि जीवन पहली बार
हमसे कुछ माँगना बंद कर दे
इतने शांत
कि मृत्यु का विचार भी
हमारे बीच बैठकर
कुछ देर आकाश देखने लगे।
- देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर