जंगल के जंगल साफ हुए
उपजाऊ भूमि पर महल खड़े हुए
बंजर भूमि यूंही पड़ी
हरी भरी दुनिया उजड़ पड़ी
मानवता नोट गिनने में लगी
सरकारें काम पन्नों में कर चली
दिखावे मात्र पर चंद पोधे लगा दिए
अगले कुछ दिनों में न रखवाली,
न देखभाल खुद ही पोधो के गले घोट दिए
लालच की राह पर
नष्ट की प्रकृति सारी
जब जरुरत पड़ी तब
प्रकृति के पास आन पड़ी दुनियां सारी
न ऊंच नीच न गरीब अमीर
प्रकृति ने दिया सभ कुछ तुम्हें
अब संभल जा ऐ लोभी व्यक्ति
पालन करना जानती है प्रकृति
और विनाश दिखाना भी जानती है प्रकृति।
दक्षल कुमार व्यास
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